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12 अप्रैल 2013

'मां योगिनी का मंदिर

कामख्या के बराबर का है मां योगिनी का मंदिर
झारखंड प्रान्त में गोड्डा जिले के पथरगामा प्रखंड में स्थित बारकोपा में मां योगिनी मंदिर है। जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर की दूर स्थित मां का मंदिर एक प्राचीन मंदिर है, जहां तंत्रों-मंत्रों के साधक अपनी सिद्धियों की प्राप्ति के लिए ते है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण द्वापर युग में हुआ था कहा जाता है महाभारत काल में यह मंदिर को गुप्त योगिनी के नाम से जाना जाता था। पांडवों ने अपने अज्ञात वर्ष का कुछ समय यहां पर भी बिताया था।
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, पत्नी सती के अपमान से क्रोधित होकर भगवान शिव जब उनका जलता हुआ शरीर लेकर तांडव करने लगे थे तो संसार को विध्वंस से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने माता सती के शव के कई टुकड़े कर दिए थे।
जहाँ-जहाँ सती के शव के वह सिद्ध पीठ के रुप में विख्यात हुए। इसी क्रम में उनकी बायीं जांघ योगिनी पहाड़ी की गुफा में गिरा था। विद्वानों का कहना है कि हमारे पुराणों में 51 सिद्ध पीठ का वर्णन है, लेकिन योगिनी पुराण ने सिद्ध पीठों की संख्या 52 बताई है। इस सिद्धस्थल को गुप्त रखा गया था। इस धाम की यह विशेषता है कि असाध्य रोगी भी मैया के आशीर्वाद से भला चंगा हो जाता है
मंदिर का गर्भगृह आकर्षण का विशेष केंद्र है। मां योगिनी मंदिर के ठीक बांयीं ओर से 354 सीढ़ी ऊपर उंचे पहाड़ पर मां का गर्भगृह है। गर्भगृह के अंदर जाने के लिए एक गुफा से होकर गुजरना पड़ता है। इसे बाहर से देखकर अंदर जाने की हिम्मत नहीं होती, क्योंकि गुफा के संकरे द्वार और अंदर चारों तरफ नुकीले पत्थर हैं, इसमें पूरी तरह अंधेरा होता है।
लेकिन जैसे ही आप गुफा के अंदर प्रवेश करते हैं, आपको प्रकाश नजर आता है, जबकि यहां बिजली की व्यवस्था नहीं है। मां की कृपा से मोटे से मोटा जातक भी मां के जय कारे लगाता हुआ इसमें से आसानी से निकल जाता है। गर्भगृह में बहुत से साध्य अपनी साधना में मग्र रहते हैं। जंगलों के बीचों-बीच में बना यह मंदिर तंत्र साधना के मामले में कामख्या के ही बराबर का है। दोनों में तीन दरवाजे हैं, दोनों मंदिरों में पूजा की प्रथा भी एक सामान है। दोनों मंदिरों में पिण्डी की ही पूजा होती है।
पहले यहाँ कम आवाजाही, रहने व जंगल की अधिकता के कारण लोग यहां दिन में भी आने से कतराते थे। 1970 के पूर्व यहां लोगों की बहुत कम आवाजाही थी और मंदिर के बाहर विशाल बरगद वृक्ष में अखंड सिंदूर का टिका लगा हुआ था। जिससे यह पता चलता था कि यहाँ कोई जागृत मां का मंदिर है।
एक साधक पाठक बाबा 1970 में यहां आये और उन्होंने पहाड़ की गुफा में मां योगिनी के असली रूप होने का खुलासा किया। इस उपलक्ष्य पर विशाल यज्ञ भी हुआ था। इसके बाद इस क्षेत्र का उत्तरोत्तर विकास होता गया  पहाड़ी श्रृंखला के बीच मां योगिनी का भव्य मंदिर व बगलरीर पर्वत की चोटी पर योगिनी गुफा। यहां हर रोज श्रद्धालुओं का मेला लगा रहता है। मंगल और शनिवार को यहां का नजारा कुछ अलग होता है।
मां योगिनी मंदिर के दाहिनी ओर की पहाड़ी पर मनोकामना मंदिर है। जो भक्त मां योगिनी के दर्शन के लिए आते हैं, वे मनोकामना मंदिर भी अवश्य जाते है। बताया जाता है कि पहले यहां नर बलि दी जाती थी। लेकिन अंग्रेजों के शासनकाल में इसे बंद करवा दिया गया। मंदिर के सामने एक बट वृक्ष है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इस बट वृक्ष पर बैठकर साधक साधना किया करते थे और सिद्धि प्राप्त करते थे।
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8 मार्च 2013

मैहर वाली मां शारदा

भारत के मध्य प्रदेश की पवित्र नगरी मैहर में स्थित है माँ शारदा का भव्य मंदिर जो देश के प्रमुख शक्ति पिठों में से एक है. माँ शारदा देवी का यह मंदिर प्रकृति के मनोरम दृश्यों से घिरा हुआ है इसके आस पास सुंदर वन क्षेत्र हरी भरी पहाड़ीयां स्थित है जो मंदिर के धार्मिक स्वरूप को और भी ज्यादा निखारती हैं. माँ शारदा का यह मंदिर त्रिकूट पर्वत के शिखर पर स्थित है जो दूर से ही भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है और जहाँ जाने की चाह हर भक्त के मन में समाई होती है.
त्रिकूट पर्वत शिखर पर स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं का पवित्र शक्ति स्थल है जहाँ जाकर सभी कि मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा माँ का आशीर्वाद प्राप्त होता है माना जाता है कि यहाँ आने वाले सभी भक्त देवी के दर्शन को पाकर अपने संकटों से मुक्त हो जाते हैं. शारदा देवी का यह शक्ति स्थल एक धाम है जिसमें नृपल देव द्वारा सामवेदी की स्थापना की गई और उसके पश्चात इस मंदिर का महत्व कई गुना बढ गया और अनेकों भक्त यहाँ आने लगे मंदिर की महत्ता का पता यहाँ आने वाले भक्तों की संख्या को देखकर ही लगाया जा सकता है. 
माँ शारदा देवी का यह भव्य मंदिर पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा है इसमें से एक कथा अनुसार जब देवी सती पिता दक्ष द्वारा किए गए अपने पति भगवान शिव के अपमान को सहन न सकीं तो वह वहाँ मौजुद यज्ञ के हवन कुंड में कूद जाती हैं इस घटना से चारों ओर कोहराम मच जाता है भगवान शिव यज्ञ को तहस नहस कर देते हैं
देवी सती के शव को यज्ञ की अग्नि से निकाल कर अपने कंधों में उठाए ब्रह्माण में विचरने लगते हैं उस समय माँ सती के अंग अनेक स्थानों पर गिरते जाते हैं और जहाँ भी उनके यह अंग गिरे वह स्थान शक्ति पीठ कहलाए. इस स्थान पर देवि सती का हार गिरा था जिस कारण इस जगह को माई का हार कहा जाने लगा और वर्तमान में यह नाम बदल कर मैहर हो गया. 
माता शारदा के बारे मे विस्तृत वर्णन दुर्गा सप्तशती एवं देवी भागवत पुराण में भी मिलता है इस मंदिर के विषय में एक अन्य कथा प्रचलित रही है जिसके अनुसार आल्हा नामक एक भक्त हुए थे जो माँ शारदा माता के परम भक्त थे उन्होंने देवी की यहाँ खूब अराधना की और कठोर तपस्या की उनकी भक्ति से प्रसन्न हो माँ शारदा ने उन्हें यहाँ साक्षात दर्शन दिए और उन्हें अपनी भक्ति का वरदान दिया था.  
मंदिर से शिलालेख भी प्राप्त हुए हैं जिनसे इस मन्दिर की प्राचीनता एवं धार्मिक महत्व का प्रतिपादन होता है. यह शिलालेख माँ शारदा की मूर्ति के नीचे देखे जा सकते हैं. पहले इस मन्दिर में पशुओं की बली का भी प्रचलन था परंतु बाद में जैन दर्शनार्थियों मतों से प्रभावित होकर यहाँ के राजा ब्रजनाथ सिंह जूदेव ने मन्दिर में बलि प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया. मैहर क्षेत्र के संदर्भ में भी कुछ साक्ष्य प्राप्त होते हैं जिनके अनुसार इस स्थान का नाम महेन्द्र के नाम से जाना जाता है. 
यहाँ आने वाले सभी लोगों की खाली झोलियों भर जाती हैं राजा हो या रंक सभी वर्ग के लोग श्रद्धा भक्ती के साथ इस स्थन पर आते हैं ओर माँ के दर्शनों की कामना करते हैं नव विवाहित दंपति यहाँ आकर अपने गृहस्थ सुख की कामना करते हैं. मंदिर में आकर मन को असीम शांति व आनंद की अनुभूति प्राप्त होती है. माँ शारदा मंदिर में विशेष उत्सव आयोजन भी होते हैं चैत्र व अश्विन माह के नवरात्रों के पावन समय मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ मौजूद रहती है इस अवसर पर मंदिर में अनेक धार्मिक कार्यक्रम संपन्न किए जाते हैं. इस अवसर पर विशेष बसों व रेलगाडी़यो का इंतज़ाम किया जाता है. 

27 फ़रवरी 2013

‘‘ख्वाजा इस्माइल चिश्ती’’

‘सामप्रदायिक सद्भावना के प्रतिक हजरत ख्वाजा इस्माइल चिश्ती अजमेर शरीफ वाले ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के भांजे हैं। ऐसी मान्यता है कि जो लोग अजमेर नहीं जा पाते उन्हें ख्वाजा इस्माइल चिश्ती की दरगाह पर सजदा करने से वह फल स्वतः मिल जाता है.......’
"ख्वाजा इस्माइल चिश्ती की दरगाह"
सदियों से भारत महान संत, महात्माओं व सूफियों की धारती रहीं है, जिन्होंने इंसनियत के टूटे धागों को जोड़कर लोगों को मानवता की सेवा करने व नेकनियती की राह पर चलने की प्रेरणा दी है। हजरत ख्वाजा इस्माइल चिश्ती भी ऐसे ही संतों में गिने जाते हैं। ख्वाजा साहब का पवित्र दरगाह उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जनपद में स्थित है।
मिर्जापुर मां विन्ध्यवासिनी शक्ति पीठ के लिए पूरे भारत में विख्यात है। इस शक्तिपीठ से लगभग दो-तीन फर्लांग में पतित पावनी मां गंगा के तट पर कंतित गांव बसा है। इस गांव के खुले भू-भाग में हजरत ख्वाजा इस्माइल चिश्ती की दरगाह है, जहां हर वर्ष सालाना उर्स लगता है। ख्वाजा साहब के कारण कंतित शरीफ के नाम से प्रसिद्ध इस गांव में लगने वाला उर्स मेला सामाजिक सद्भावना की मिसाल पेश करता आया है।
इस उर्स मेले में पूरे भारतवर्ष से भारी संख्या में हिन्दू, मुसलमान, सिख, इसाई आदि सभी धार्मों के लोग जियारत करने आते हैं। मुरादें मांगते हैं तथा पूरी होने पर चादर चढ़ाते हैं और सिरनी बांटते हैं। इस मेले की सबसे बड़ी खासियत यह है कि बाबा की मजार पर उर्स मेला आरम्भ होने के पूर्व पहली चादर हिन्दू परिवार द्वारा चादर चढ़ाने के बाद मेला शुरू होता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में हिन्दू परिवार द्वारा पहला चादर चढ़ाने की प्रथा सदियों पुरानी है।
लगभग 40-50 वर्षो से, चादर चढ़ाने का काम नगर के कसरहट्टी मोहल्ला निवासी हिन्दू कसेरा परिवार के जवाहर लाल कसेरा करने लगे। तब से उन्हीं के परिवार द्वारा मजार पर चादर चढ़ायी जाती है। 70 वर्ष पार कर चुके जवाहर लाल कसेरा के पुत्र बताते है कि बाबा कि मजार पर चादर चढ़ाने से पूर्व उनके परिवार की माली हालत काफी नाजुक थीं। उनकी मां एक लाइलाज बीमारी की चपेट में आ गयी थी। वंश चलने की उम्मीद खत्म हो गयी थी। इन कारणों से हमारे पिताजी की बाबा पर असीम आस्था बनती चली गई। आज बाबा की मेहरबानी व कृपा के चलते हम नौ भाई-बहन हैं। हमारे व्यवसाय में दिनों-दिन बढ़ोत्तरी हो रही है। अपने पुश्तैनी पीतल के बर्तन के व्यवसाय के अलावा हमने मेडिकल स्टोर भी खोल लिया है। पिता जी के वृद्ध होने के कारण अब बाबा की मजार पर हम मेले में पहले पहला चादर चढ़ाकर बाबा का सजदा करते हैं।
जन साधारण की मान्यता है कि जो शख्स अजमेर के ख्वाजा गरीब नबाज की दरगाह तक नहीं पहुँच पाते हैं, वे कंतित शरीफ बाबा की दरगाह में मन्नत मांगते हैं और उसके पूरा होने पर चादर चढ़ाते हैं। इससे उन्हें स्वतः ही अजमेर शरीफ वाले बाबा की दुआ प्राप्त हो जाती है।
मिर्जापुर वाले हजरत ख्वाजा सैयद इस्माइल चिश्ती इन्हीं अजमेर वाले ख्वाजा नवाज के सगे भांजे थे। इनका जन्म अरबी तारीख 13 सावानुल मुआज्ज्म 579 हिजरी दिन सोमवार की सुबह संजरिस्तान (ईरान) में हुआ था। इनके पिता हजरत ख्वाजा सैयद इसहाक कादरी बड़े पीर साहब शेख अब्दुल कादिर जिलानी बगदादी के साहबजादे के मुरीद थे और उन्हीं से खिलाफत भी हासिल थी।
"उर्स के समय सजा दरगाह"
ख्वाजा इस्माइल चिश्ती ने अपने वालिद से मजहब की तालीम हासिल की थी। बताते हैं ख्वाजा गरीब नवाज को मदीने वाले हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्लाहों अली मुसल्लम ने वसारत दी, “ऐ मोइनुद्दीन, तुम अजमेर जाओ।“ मदीने वाले हजरत की वसारत पर ख्वाजा गरीब नवाज चलने लगे तो इनकी बहन उम्मुल खैर का लाड़ला बेटा इस्माइल चिश्ती भी अपने वालिद-वालिदा से मामा के साथ जाने की इजाजत मांगने लगे। इस्माइल चिश्ती के वालिद-वालिदा ने न केवल उन्हें इजाजत दी बल्कि वे भी खुदा की बंदगी के लिए उनके साथ चलने को तैयार हो गए।
यह नूरानी काफिला जगह-जगह पड़ाव डालता हुआ लाहौर पहुंचा। यहां कुछ दिनों तक कयाम (विश्राम) किया। दौराने कयाम ख्वाजा इस्माइल चिश्ती के वालिद हजरत ख्वाजा सैयद इसहाक कादरी बहुत सख्त बीमार हो गए। इसी बीमारी के दौरान कुछ दिनों बाद वह अल्लाह को प्यारे हो गए। आज भी लाहौर में उनकी मजार शरीफ मौजूद है।
इसके बाद यह काफिला आगे बढ़ा और विभिन्न जगहों से होते हुए अजमेर पहुंच गया। अजमेर पहुँचने के बाद गरीब नवाज ने इस्माइल चिश्ती को अवधा की तरफ जाने का आदेश दिया।
ख्वाजा गरीब नवाज के आदेश पर खुदा की बंदगी करते हुए ख्वाज इस्माइल चिश्ती अपने परिवार व कुछ अनुयायियों के साथ विभिन्न जगहों पर होते हुए लखनऊ पहुंच गए। इन्हें लखनऊ आए अभी चन्द महीने ही बीते थे कि एक दिन स्वप्न में ख्वाजा गरीब नवाज ने इस्माइल चिश्ती से कहा, “अब तुम मिर्जापुर की तरफ कूच करो। वहां लोगों को तुम्हारी सख्त जरूरत है, क्योंकि वहां के लोगों पर राजा के जुल्म का कहर टूट रहा है। हर व्यक्ति एक-दूसरे के खून का प्यासा है।“
ख्वाजा गरीब नवाज की वसारत पर ख्वाज इस्माइल चिश्ती लखनऊ से मिर्जापुर की तरफ चल पड़े। बताते है, उस समय गहरवार राजपूत वंश शासन परम्परा में अवध्राज के अंर्तगत शासित राज्य में राजा दानव राय का शासन था। दानव राय प्रतापी और न्याय प्रिय शासक के रूप में जाना जाता था, इसलिए उसे राज दइया नाम से प्रसिद्धि मिली थी।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार कंतित नाग राजाओं की राजधानी हुआ करती थी। यह राजा दइया की भी राजधानी थी। उसका विशाल किला ओेझला नदी के किनारे से विन्ध्यवासिनी तक स्थित था। किले के उत्तरी छोर पर उस समय चेतगंज के समीप से गंगा बहती थी। राजा दइया ने अपनी रानियों के स्नान के लिए गंगा से मिलता हुआ एक नाला बनवा रखा था, जो ओझला नदी में मिलता था।
राज दइया प्रतापी होने के साथ ही आततायी भी था। उसने गंगा के जल को स्पर्श करने पर एक समुदाय विशेष के लोगों पर पाबंदी लगा रखी थी। राजा की आज्ञा न मानने वाले को दण्डित किया जाता था। उसका मानना था कि हिन्दू धर्म के अलावा अन्य लोगों के स्पर्श से गंगा अपवित्र हो जाएगी। राजा की तानाशाही इतनी बढ़ गयी कि ओझला में समुदाय विशेष के लोगों के स्नान पर रोक लगा दी गयी।
ख्वाजा गरीब नवाज की वसारत पर जब इस्माइल चिश्ती साहब ने मिर्जापुर में कदम रखा तो उन्होंने सर्वप्रथम अपना पड़ाव कंतित गांव में स्थित शाही मस्जिद में किया। वह यहीं पर नमाज पढ़ते, इबादत करते और लोगों को ज्ञान का पाठ पढ़ाते।
विन्ध्यवासिनी की गोंद में प्रकृति के वैभव से परिपूर्ण गंगा के तट पर स्थित कंतित गांव ने ख्वाजा साहब का मन जीत लिया। ख्वाजा साहब को जब राजा दइया के कठोर जनहित विरोधी फैसलों की जानकारी हुई तो उन्होंने कंतित को ही अपनी कर्मभूमि बनाकर पीडित मानवता का उद्धार करने की ठान ली।
ख्वाजा साहब ने पहले अपने उपदेशों से लोगों में फैले भ्रम को दूर करने का प्रयास किया, लेकिन इससे उन्हें सफलता नहीं मिली तो उन्होंने अपना चमत्कार दिखाना प्रारम्भ कर दिया। बताते हैं, ख्वाजा के अनुयायी एक दिन गंगा नदी के तट पर पहुंचे तो घाटन देव नामक एक सिपहसालार ने उन्हें रोक दिया।
"ख्वाजा साहब की मजार"
यह जानकारी जब ख्वाजा साहब को हुई तो उन्होंने अपने प्रभाव से घाट पर रखे पत्थर के हाथी से सजीव रूप में गंगा की लहरों में रात्रि स्नान करने के बाद उसकी चिघांड सुनवाई। बाबा के इस चमत्कार की चारों तरफ चर्चा होने लगी। राजा के सिपहसालारों ने यह जानकारी राजा को दी तो उसने ख्वाजा साहब को युद्ध के लिए मजबूर करना शुरू कर दिया। शान्तिप्रिय ख्वाजा साहब यह नहीं चाहते थे। वे अपने चमत्कारों से राजा का मन बदलने को प्रयास करते रहे।
लेकिन दिन पर दिन राजा का व्यवहार ख्वाजा साहब के प्रति कठोर होता गया। अब तो उन्हें बार-बार सिपहसालारों एवं सौनिकों द्वारा परेशान भी किया जाने लगा। आखिरकार जब ख्वाजा साहब ने सोच लिया कि राजा दइया नहीं मानने वाला है, तो उन्होंने अपने वजू के पात्र को अल्लाह का ध्यान कर पलट दिया। उसके पलटते ही जैसे भूचाल आ गया और राजा का पूरा किला तहस-नहस हो गया। इसके अवशेष आज भी कंतित के गजिया में गंगा नदी के किनारे दिखाई पड़ता हैं।
राजा के आतंक से मुक्ति के बाद भी जीवनभर ख्वाजा साहब कंतित गांव में ही रहे और इसी जगह को अपना समझ कर लोगों को नेकनियती की राह पर चलने की प्ररेणा देते रहे।
छः रजक 671 हिजरी जुमे (शुक्रवार) की भोर में ख्वाजा साहब का इंतकाल हो गया। बाद में लोगों ने यहां पर इनकी मजार बना दी। बताते है, ख्वाजा इस्माइल चिश्ती की मजार पर लगनेवाले उर्स मेले में हिन्दू परिवार द्वारा पहला चादर चढ़ाने का सिलसिला देवी अख्तार के जमाने से शुरू हुआ जो आज तक अनवरत चला आ रहा है।
ख्वाजा के प्रति देवी अख्तार की आस्था के बारे में भी एक दिलचस्प कहानी है। बताते हैं कि देवी अख्तार प्रतिदिन शाम के समय काम-धाम से खाली होने के बाद अपनी पत्नी से डलिया तैयार करवाते थे। उसमें फूल-माला, अगरबत्ती, दीपक आदि पूजा की सामग्री होती थी। उसे लेकर वह पूजापाठ के लिए घर से निकल जाते थे और रास्ते में पड़ने वाल सभी मंदिर, मस्जिद, मजार पर विधिवत पूजा-पाठ करके कंतित शरीफ मजार पर जाते थे।
एक दिन इत्तेफाक से काम-धन्धे में फस जाने के कारण उन्हें कुछ देर हो गई। उस दिन मौसम भी कुछ खराब था, फिर भी वह पूजा-पाठ और सजदा करने लिए घर से निकल गए। जगह-जगह पूजापाठ करते-करते रात्रि के लगभग 10 बज गए। फिर वह ख्वाजा साहब का सजदा करने कंतित की तरफ चल पड़े
उस समय रास्ते में पड़ने वाले ओझला नदी में पुल नहीं बना था। रह-रहकर बरसात होने लगती थी। अपनी धुन के पक्के देवी अख्तार के कदम तेजी के कंतित की तरफ बढ़े जा रहे थे। बरसात के कारण ओझला नदी उफान पर थी, पर वह हताश नहीं हुए और पानी में उतर गए। अभी वह थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि एक गड्ढ़े में पैर चले जाने से डलिया उनके हाथ से छूट कर पानी में गिर गई और लहरों के साथ बहने लगी।
निराश होकर देवी अख्तार ने ख्वाजा साहब की मजार की दिशा में देखा ही था कि लहरों के चक्रव्यूह में फस कर उनके पूजा की डलिया वापस उनके पास आ गई और पानी का बहाव भी कम हो गया। देवी अख्तार आराम से ख्वाजा साहब का सजदा कर वापस अपने घर आ गये।
इन सबके अलावा भी बाबा को मानने वाले बड़ी धूम-धाम से प्रत्येक उर्स मेले में दागर-चादर चढ़ाते हैं। इनमें एक परिवार हैं छोटा मिर्जापुर निवासी हाफिज मौलाना निसार अहमद चिश्ती निजामी का। आज से लगभग 125 वर्ष पूर्व इनके वंशज मुहम्मद गाजी ने अपनी किसी मनौती के पूर्ण होने पर बाबा के मजार पर चादर चढ़ानी शुरू की। इनके बाद इन्हीं के परिवार के भग्गल खलीफा इसे आगे चलाते चले आए। बाद में इनके पुत्र रहमतुल्ला ने यह दायित्व निभाया। बाद में उनके छोटे भाई सल्लामतुल्ला तो बाबा को इतना मानने लगे कि वह अपना अधिक-से-अधिक समय ख्वाजा साहब की मजार पर ही देने लगे। अब उनके वंशज पूरी श्रद्धा के साथ इस परम्परा को निभा रहे हैं।
ख्वाजा साहब के पास ही जहरत हाफिज लौंगिया पहलवान की भी मजार है। बताया जाता है यह ख्वाजा साहब से भी उम्रदराज थे। माना जाता है कि यह भी ख्वाजा साहब के साथ ही आये थे। ऐसी मान्यता है कि ख्वाजा साहब की जियारत करने के बाद इनकी जियारत करना बहुत जरूरी है।
लोगों का विश्वास है कि मानवता के कल्याण को समर्पित गरीब नवाज ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के सगे भांजे ख्वाजा इस्माइल चिश्ती की मजार पर अपना दुखड़ा रोने से तमाम लोगों का भला होता रहा है। बैऔलादों को औलाद, दरिद्र को धन-धान्य से भरने जैसी कई कहानियां ख्वाजा साहब से जुड़ी है।
बताते है एक व्यापारी अपनी सारी जमा-पूजी लगाकर कुछ सामान खरीद कर व्यापार करने जा रहा था। रास्ते में लुटेरे पूरा ट्रक सहित माल लूट ले गए। निराश व्यापारी बाबा की चौखट पर अपना दुखड़ा राने लगा। बाद में उसे लूटा गया माल ट्रक साहित वापस मिल गया। उसने इसे ख्वाजा साहब का चमत्कार मानकर उनकी मजार का जीर्णोद्धार करवा दिया।
विन्ध्याचल का शक्तिपीठ हिन्दु धार्मावलम्बियों के लिए जितनी आस्था का प्रतीक है, उतनी ही मान्यता कंतित के मजार को भी प्राप्त है। यह सभी धर्मों की आस्था का प्रतीक है। श्रद्धा और विश्वास से बाबा की चैखट पर मन्नत मांगने से बाबा उसे अवश्य पूरी करते हैं।

21 फ़रवरी 2013

आदिशक्ति माँ विंध्यवासिनी

मां विन्ध्यवासिनी
प्रयाग एवं काशी के मध्य विंध्याचल नामक तीर्थ है जहां माँ विंध्यवासिनी निवास करती हैं। श्री गंगा जी के तट पर स्थित यह महातीर्थ शास्त्रों के द्वारा सभी शक्तिपीठों में प्रधान घोषित किया गया है। यह महातीर्थ भारत के उन 51 शक्तिपीठों में प्रथम और अंतिम पीठ है जो गंगातट पर स्थित है। महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्।हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचलपर आप सदैव विराजमान रहती हैं। पद्मपुराणमें विंध्याचल-निवासिनीइन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है- विन्ध्येविन्ध्याधिवासिनी।
श्रीमद्देवीभागवतके दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकत्र्ता ब्रह्माजीने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपाको उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुवमनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ।
मां अष्टभुजा
त्रेतायुगमें भगवान श्रीरामचन्द्र सीताजीके साथ विंध्याचलआए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वर महादेव से इस शक्तिपीठ की माहात्म्य और बढ गया है। द्वापरयुगमें मथुरा के राजा कंस ने जब अपने बहन-बहनोई देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया और वह उनकी सन्तानों का वध करने लगा। तब वसुदेवजीके कुल-पुरोहित गर्ग ऋषि ने कंस के वध एवं श्रीकृष्णावतारहेतु विंध्याचलमें लक्षचण्डीका अनुष्ठान करके देवी को प्रसन्न किया। जिसके फलस्वरूप वे नन्दरायजीके यहाँ अवतरित हुई।
मार्कण्डेयपुराणके अन्तर्गत वर्णित दुर्गासप्तशती(देवी-माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय में देवताओं के अनुरोध पर भगवती उन्हें आश्वस्त करते हुए कहती हैं, देवताओं वैवस्वतमन्वन्तर के अट्ठाइसवेंयुग में शुम्भऔर निशुम्भनाम के दो महादैत्यउत्पन्न होंगे। तब मैं नन्दगोपके घर में उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से अवतीर्ण हो विन्ध्याचल में जाकर रहूँगी और उक्त दोनों असुरों का नाश करूँगी।
लक्ष्मीतन्त्र नामक ग्रन्थ में भी देवी का यह उपर्युक्त वचन शब्दश:मिलता है। ब्रज में नन्द गोप के यहाँ उत्पन्न महालक्ष्मीकी अंश-भूता कन्या को नन्दा नाम दिया गया। मूर्तिरहस्य में ऋषि कहते हैं- नन्दा नाम की नन्द के यहाँ उत्पन्न होने वाली देवी की यदि भक्तिपूर्वकस्तुति और पूजा की जाए तो वे तीनों लोकों को उपासक के आधीन कर देती हैं।
मां काली
श्रीमद्भागवत महापुराणके श्रीकृष्ण-जन्माख्यान में यह वर्णित है कि देवकी के आठवें गर्भ से आविर्भूत श्रीकृष्ण को वसुदेवजीने कंस के भय से रातोंरात यमुनाजीके पार गोकुल में नन्दजीके घर पहुँचा दिया तथा वहाँ यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा ले आए। आठवीं संतान के जन्म का समाचार सुन कर कंस कारागार में पहुँचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर जैसे ही पटक कर मारना चाहा, वैसे ही वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुँच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित किया। कंस के वध की भविष्यवाणी करके भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।
मन्त्रशास्त्रके सुप्रसिद्ध ग्रंथ शारदातिलक में विंध्यवासिनी का वनदुर्गा के नाम से यह ध्यान बताया गया है-
सौवर्णाम्बुजमध्यगांत्रिनयनांसौदामिनीसन्निभां चक्रंशंखवराभयानिदधतीमिन्दो:कलां बिभ्रतीम्। ग्रैवेयाङ्गदहार-कुण्डल-धरामारवण्ड-लाद्यै:स्तुतां ध्यायेद्विन्ध्यनिवासिनींशशिमुखीं पा‌र्श्वस्थपञ्चाननाम्॥
जो देवी स्वर्ण-कमल के आसन पर विराजमान हैं, तीन नेत्रों वाली हैं, विद्युत के सदृश कान्ति वाली हैं, चार भुजाओं में शंख, चक्र, वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं, मस्तक पर सोलह कलाओं से परिपूर्ण चन्द्र सुशोभित है, गले में सुन्दर हार, बांहों में बाजूबन्द, कानों में कुण्डल धारण किए इन देवी की इन्द्रादिसभी देवता स्तुति करते हैं। विंध्याचलपर निवास करने वाली, चंद्रमा के समान सुंदर मुखवालीइन विंध्यवासिनी के समीप सदाशिवविराजितहैं।
सम्भवत:पूर्वकाल में विंध्य-क्षेत्रमें घना जंगल होने के कारण ही भगवती विन्ध्यवासिनीका वनदुर्गा नाम पडा। वन को संस्कृत में अरण्य कहा जाता है। इसी कारण ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी विंध्यवासिनी-महापूजा की पावन तिथि होने से अरण्यषष्ठी के नाम से विख्यात हो गई है।